अनुच्छेद 17 इस प्रकार है :- " 'अस्पृश्यता' का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। 'अस्पृश्यता' से उपजी किसी निर्योग्यता को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा।"
संसद को अनुच्छेद 35 में यह अधिकार दिया गया है कि वह विधि द्वारा इस अपराध के लिए दण्ड निश्चित करे।
इस शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद ने अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 को अधिनियमित किया था। जिसे संशोधित करके उसका नाम सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम,1976 किया गया।
अस्पृश्यता की परिभाषा न तो संविधान में दी गई है और न ही उपर्युक्त अधिनियम में। यह कहा गया है कि इसका अर्थ सभी जानते हैं। यह उस सामाजिक पद्धति से अवगत कराता है जिसमें कुछ वर्गों को उनके जन्म के कारण ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। इस अधिनियम में कुछ कार्य जो छुआछूत के आधार पर किये जाते हैं, उन्हें अपराध माना गया है और उनके लिये दण्ड निश्चित किया गया है :-
(क) किसी व्यक्ति को किसी सामाजिक संस्था में जैसे अस्पताल, औषधालय, शिक्षा संस्था प्रवेश न देना।
(ख) किसी व्यक्ति को सार्वजानिक उपासना के स्थल में पूजा करने से वर्जित करना।
(ग) किसी दुकान, रेस्तरां, होटल या सार्वजानिक मनोरंजन के किसी स्थान पर पहुँचने से रोकना या किसी जलाशय, नल या जल के अन्य स्रौत, मार्ग, श्मशान या अन्य सार्वजनिक स्थान पर पहुँचने से रोकना।
1976 में संशोधन के उपरांत अस्पृश्यता के अपराध के अंतर्गत निम्नलिखित कृत्य भी रख दिए गए हैं :-
(1) अनुसूचित जाति के किसी सदस्य का अस्पृश्यता के आधार पर अपमान करना।
(2) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अस्पृश्यता का उपदेश देना।
(3) इतिहास, दर्शन या धर्म के आधार पर या जाति व्यवस्था की परम्परा के आधार पर अस्पृश्यता को सही ठहराना।
यदि अनुसूचित जाति का कोई सदस्य उपर्युक्त अपराध का शिकार होता है तो न्यायालय, जब तक प्रतिकूल साबित न किया जाये तब तक, यह उपधारणा करेगा कि ऐसा अपराध अस्पृश्यता के आधार पर किया गया है।
संविधान में ही अस्पृश्यता के विरुद्ध प्रतिषेध को इस अधिनयम द्वारा प्रभावी रूप दिया गया है।
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3 comments:
Hello sir mujhe untouchability ke bare or bate aap bata sakte he plz
जातीय भेदभाव आज भी जारी है कोन कहता है समाप्त हो गया ,यह भारत के लोगो उच्च वर्णों के लिए बड़े सरम की बात है कि वे भेदभाव करते है ।
बड़ी भेदभाव की सिकार है आज भी भारत की मानवता
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