पहले article में हमने संविधान की उद्देशिका एवं उसके उद्देश्य और विशेषताओं के बारे में जाना था। इस article में हम संविधान की प्रकृति के बारे में जानेंगे।
भारतीय संविधान की प्रकृति के बारे में विद्वानों के मत
डॉ• भीमराव अम्बेडकर ने कहा है कि "भारतीय संविधान समयानुसार एकात्मक और संघात्मक हो सकता है।"
प्रो• के• सी• ह्वियर के अनुसार "भारतीय संविधान एक अर्द्धसंघीय संविधान है।"
एस• आर• बोम्मई बनाम भारत संघ के वाद में उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भारतीय संविधान परिसंघीय संविधान है।
संविधान की प्रकृति के अनुसार संविधान को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है :-
1. परिसंघात्मक संविधान।
2. एकात्मक संविधान।
1. संघात्मक संविधान - इसमें केंद्र एवं राज्य में शक्तियों का विभाजन होता है। संघात्मक संविधान के अंतर्गत मुख्यतया दो प्रकार की सरकारो की स्थापना की जा सकती है - 1. संसदीय, 2.अध्यक्षात्मक। अमरीका की सरकार अध्यक्षात्मक होती है। संघात्मक संविधान के लक्षण :-
( i ) शक्तियों का विभाजन - संघात्मक संविधान में केंद्रीय और प्रान्तीय सरकारों के मध्य शक्तियों का विभाजन होता है।
(ii) संविधान की सर्वोच्चता - परिसंघीय राज्य का जन्म संविधान से होता है। प्रत्येक शक्ति चाहे वह परिसंघ की हो या संघटक राज्यों की, संविधान के अधीन होती है औऱ संविधान द्वारा नियंत्रित होती है।
(iii) द्वैध शासन - परिसंघात्मक राज्य में दो सरकारें होती हैं। राष्ट्रीय या परिसंघीय सरकार और प्रत्येक संघटक राज्य की सरकार।
(iv) स्वतंत्र न्यायपालिका - परिसंघात्मक संविधान में केंद्र और राज्य सरकारें एक दूसरे की अधिकारिता में अतिक्रमण न करें। इसलिए न्यायपालिका का स्वतंत्र होना आवश्यक है।
2. एकात्मक संविधान - एकात्मक संविधान वह होता है जिसमें समस्त शक्तियाँ एक ही सरकार में निहित होती हैं जो केंद्रीय सरकार होती है तथा राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के अधीन रहना पड़ता है।एकात्मक संविधान के प्रमुख लक्षण :-
(i) राज्यपालों की नियुक्ति - राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है तथा राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त राज्यपाल पद धारण करता है।【अनु• 155-156】
राज्य विधानमण्डल द्वारा पारित विधेयक को कुछ मामलों में राष्ट्रपति के विचार के लिए राज्यपाल सुपुर्द कर सकता है।
(ii) राष्ट्रहित में कानून बनाने की संसद की शक्ति - राज्यसभा अपने सदस्यों के दो तिहाई बहुमत द्वारा यह घोषित कर दे कि राष्ट्रहित में आवश्यक है कि राज्य सूची के विषय पर संसद कानून बनाये तो संसद राज्य सूची के विषय पर कानून बना सकती है। 【अनु• 249】
(iii) नए राज्यों के निर्माण, वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों को बदलने की संसद की शक्ति - राज्यों का अस्तित्व संसद की इच्छा पर निर्भर है। संसद नए राज्यों का निर्माण कर सकती है, वर्तमान राज्यो के क्षेत्रों तथा सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है।उनके नाम भी बदल सकती है। 【अनु•03】
(iv) एकल नागरिकता - भारतीय नागरिकों को संविधान के अनुसार एकल नागरिकता प्राप्त है। 【अनु• 05 - 11】
उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है की भरतीय संविधान परिस्थतियों के अनुसार एकात्मक और संघात्मक हो सकता है।
Thanks.......
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